नकाब उठाईये, जरा पर्दे गिराईये
हसरत है जो आंखोमे, जुबां पे लाईये ..
न होगा हमसे वफ़ा का झूठा सलाम
लौटके जब न हो जाना , तब ही आईये ...
तमन्ना है तुम्हे छुपा के रखु कही
खुद ही आकर इन पलकोंको सजाईये...
दुनियाकी क्यू बिनवजह फ़िक्र है तुम्हे
ये खुबसुरत चोरी सामने से कर जाईये ..
--- अभिजित ...
I am as elusive, as you allow me to be.. I am as opaque, as you read me more.. I am as possesive, as you claim on me.. I am as fluent, as you ease me.. I am as impossible, as memories try to erase me ..
Monday, June 9, 2008
Wednesday, June 4, 2008
आज कल ख्वाब भी नये है
आज कल ख्वाब भी नये है
किसी ने अभी अभी बोये है
क्यू जगा रहे हो हमे यारों
कुछ चंद पल ही तो सोये है
पलकोंके आसपास कहीं
एक जगह वो खास कहीं
वहीं छुपे कुछ हमसाये है....
आज कल...
आकाश जितना ऊंचा ख्वाब
जमींसे है उम्दा सिंचा ख्वाब
खुशी से बादल भी रोये है...
आज कल...
धुंधला सा कोहरा हल्का सा
बूंद बूंद सपना छल्का सा
रोज इसी मोड पे खोए है...
आज कल...
--- अभिजित गलगलीकर ..... ४-६-०८ .....
किसी ने अभी अभी बोये है
क्यू जगा रहे हो हमे यारों
कुछ चंद पल ही तो सोये है
पलकोंके आसपास कहीं
एक जगह वो खास कहीं
वहीं छुपे कुछ हमसाये है....
आज कल...
आकाश जितना ऊंचा ख्वाब
जमींसे है उम्दा सिंचा ख्वाब
खुशी से बादल भी रोये है...
आज कल...
धुंधला सा कोहरा हल्का सा
बूंद बूंद सपना छल्का सा
रोज इसी मोड पे खोए है...
आज कल...
--- अभिजित गलगलीकर ..... ४-६-०८ .....
Wednesday, May 28, 2008
आपकी यादें
चलता रहता हूं इस साहिल पे
आपकी यादें लहरें बनकर मिलती है
देखता रहता हूं उस फ़लक को
जहां आप चांदनी बनकर मिलती है
यादें तो बन चुकी है साया मेरा
धीरे से पिछे पिछे चलती है
मुडके देखूं तो कोई नही रहता
यूंही मुझे तरसाती रहती है
इस गीली सी रेत पर मै खडा
पांव के निचे से वो सरकती हुई
विश्वास है मेरे ही बनोगे तुम
फ़िर भी लगता है जाँ छुटती हुई ..
आपकी यादें लहरें बनकर मिलती है
देखता रहता हूं उस फ़लक को
जहां आप चांदनी बनकर मिलती है
यादें तो बन चुकी है साया मेरा
धीरे से पिछे पिछे चलती है
मुडके देखूं तो कोई नही रहता
यूंही मुझे तरसाती रहती है
इस गीली सी रेत पर मै खडा
पांव के निचे से वो सरकती हुई
विश्वास है मेरे ही बनोगे तुम
फ़िर भी लगता है जाँ छुटती हुई ..
Sunday, May 18, 2008
सुरमई साद..
सुरमई साद , नवीन क्षणांची
कोवळी उब, उगवत्या किरणांची
मुक्त रंग उधळत दिवस उमलला
चिंब भिजत नखशिखांत सजला
मंगल वर्षा होतेय स्वप्नसुमनांची
सुरमई ...
सावळी सांज लाजत सावरत येते
अवखळ अल्लड,धुंद बावरत येते
ऎकवते आठवण निर्मळ कवनांची
सुरमई ...
हळवी रात्र जागवी अलवार स्वप्नं
पळभर न चैन, उधळी स्मृतीरत्नं
सांगते गोष्ट दोन हळूवार मनांची
सुरमई ...
कोवळी उब, उगवत्या किरणांची
मुक्त रंग उधळत दिवस उमलला
चिंब भिजत नखशिखांत सजला
मंगल वर्षा होतेय स्वप्नसुमनांची
सुरमई ...
सावळी सांज लाजत सावरत येते
अवखळ अल्लड,धुंद बावरत येते
ऎकवते आठवण निर्मळ कवनांची
सुरमई ...
हळवी रात्र जागवी अलवार स्वप्नं
पळभर न चैन, उधळी स्मृतीरत्नं
सांगते गोष्ट दोन हळूवार मनांची
सुरमई ...
Tuesday, May 13, 2008
निःशब्द कविता
कोवळी, मनसोवळी तू
अलवार सोनसळी तू
करवंदी , जास्वंदी तू
सुवासिक मृद्गंधी तू
सावनी , अस्मानी तू
सौंदर्य आरस्पानी तू
आशा , अभिलाषा तू
स्वप्नांची परिभाषा तू
माझी निःशब्द कविता तू
ओतप्रोत भाव-सरिता तू
-- अभिजित ... १३-५-०८ ..
अलवार सोनसळी तू
करवंदी , जास्वंदी तू
सुवासिक मृद्गंधी तू
सावनी , अस्मानी तू
सौंदर्य आरस्पानी तू
आशा , अभिलाषा तू
स्वप्नांची परिभाषा तू
माझी निःशब्द कविता तू
ओतप्रोत भाव-सरिता तू
-- अभिजित ... १३-५-०८ ..
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