आज तू आलीस
सहज आत शिरलीस
'हाय' केलंस हसरं
खळखळतं जिवंत असं..
काय गप्पा रंगल्या
कुठल्याशा विषयात दंगल्या..
मग एकदम कुठुन तरी
सांजझुळुका किणकिणल्या..
"आता येते" म्हणलीस
तुला बाय करण्यात
तुझ्या वळत्या नजरेत
श्वास अडकून गेला..
अन मुठीत अडकलेला
काळ सुटून गेला ..
I am as elusive, as you allow me to be.. I am as opaque, as you read me more.. I am as possesive, as you claim on me.. I am as fluent, as you ease me.. I am as impossible, as memories try to erase me ..
Tuesday, July 1, 2008
Sunday, June 29, 2008
तुझा हट्ट
तू मला मा्गावं काहीतरी
मी जिवाचं मग रान करावं
हौस पुरी झाली एकदा की
तू खुदकन गोडसं हसावं
परत तुझा नवीन हट्ट
मी तो अलगद पुरवण्याचा
स्मितभर हसतो अता मी
उगा प्रयत्न करतो नभांतून
शेवटचा टाटा करण्याचा...
मी जिवाचं मग रान करावं
हौस पुरी झाली एकदा की
तू खुदकन गोडसं हसावं
परत तुझा नवीन हट्ट
मी तो अलगद पुरवण्याचा
स्मितभर हसतो अता मी
उगा प्रयत्न करतो नभांतून
शेवटचा टाटा करण्याचा...
Saturday, June 28, 2008
इक रिश्ता
कुछ ऐसा इक रिश्ता उनसे जोडना चाहता हूं
हल्की दरार भी न हो , ऎसा जुडना चाहता हूं
ओंस की बूंदे आंखों मे छाई है थोडी थोडी
कुछ नमी उन सांसों मे भी पिरोना चाहता हूं
उन्हें भुलाने की बहुत कोशिश की इन दिनों
कैसे वो समझ जाते है मै उन्हे बुलाना चाहता हूं
मेरे समंदर को किनारों की कमी न थी कभी
उस एक को ही क्यूं बार बार टकराना चाहता हूं
आसमां मे उडने का शौक मुझे बहुत ज्यादा है
मेरी जमीं के आशिकों को क्यूं छोडना चाहता हूं
उन्हें कहने की कुछ हिम्मत नही होती अब भी
उनके हसने में सांवरे अल्फ़ाज ढूंढना चाहता हूं
हल्की दरार भी न हो , ऎसा जुडना चाहता हूं
ओंस की बूंदे आंखों मे छाई है थोडी थोडी
कुछ नमी उन सांसों मे भी पिरोना चाहता हूं
उन्हें भुलाने की बहुत कोशिश की इन दिनों
कैसे वो समझ जाते है मै उन्हे बुलाना चाहता हूं
मेरे समंदर को किनारों की कमी न थी कभी
उस एक को ही क्यूं बार बार टकराना चाहता हूं
आसमां मे उडने का शौक मुझे बहुत ज्यादा है
मेरी जमीं के आशिकों को क्यूं छोडना चाहता हूं
उन्हें कहने की कुछ हिम्मत नही होती अब भी
उनके हसने में सांवरे अल्फ़ाज ढूंढना चाहता हूं
Wednesday, June 25, 2008
सुन ले ऎ जिंदगी
सुन ले ऎ जिंदगी, तू मुझे यूंही डरा नही सकती
आखिर तक खेलूंगा मै, ऎसे ही हरा नही सकती
ख्वाब ही ख्वाब चुने थे मैने इस पूरी राह भर
पूरे किए बिना तू मुझे मुझसे चुरा नही सकती
तुझसे मिठेसे मरासिम कभी न जुड सके
तिखी यारी निभाके तू यूं मुस्कुरा नही सकती
कहने दे मुझे जो भी दिल मे छुपा रखा है
बिन कुछ बोले तू मुझे झूठा ठहरा नही सकती
लिखता रहूंगा आखरी सांस रहेगी जब तक
घुटके जीने का जुर्म तू मुझसे करा नही सकती
आखिर तक खेलूंगा मै, ऎसे ही हरा नही सकती
ख्वाब ही ख्वाब चुने थे मैने इस पूरी राह भर
पूरे किए बिना तू मुझे मुझसे चुरा नही सकती
तुझसे मिठेसे मरासिम कभी न जुड सके
तिखी यारी निभाके तू यूं मुस्कुरा नही सकती
कहने दे मुझे जो भी दिल मे छुपा रखा है
बिन कुछ बोले तू मुझे झूठा ठहरा नही सकती
लिखता रहूंगा आखरी सांस रहेगी जब तक
घुटके जीने का जुर्म तू मुझसे करा नही सकती
Sunday, June 22, 2008
In response to deepa's poem ...
इस घर को सजाऊं किस किस तरह
अपनासा लगने लगे, फ़िर जा सको तो जाइयेगा
हवाओं का रुख यूं ना मोड सकोगे तुम
मेरे साथ जरा बहो, फ़िर जा सको तो जाइयेगा
साहिल पे लहरे भी है , ढलता सूरज भी
मुझमे पैर भिगो लो, फ़िर जा सको तो जाइयेगा
तुम्हारी मेरी डगर शायद अलग अलग हो
किसी मोड पे मिलेंगे, फ़िर जा सको तो जाइयेगा
अल्फ़ाजों के खेल मुझको शायद नही आते
आखों से रोक लू, फ़िर जा सको तो जाइयेगा
अपनासा लगने लगे, फ़िर जा सको तो जाइयेगा
हवाओं का रुख यूं ना मोड सकोगे तुम
मेरे साथ जरा बहो, फ़िर जा सको तो जाइयेगा
साहिल पे लहरे भी है , ढलता सूरज भी
मुझमे पैर भिगो लो, फ़िर जा सको तो जाइयेगा
तुम्हारी मेरी डगर शायद अलग अलग हो
किसी मोड पे मिलेंगे, फ़िर जा सको तो जाइयेगा
अल्फ़ाजों के खेल मुझको शायद नही आते
आखों से रोक लू, फ़िर जा सको तो जाइयेगा
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