Friday, December 19, 2008

रफ़ू-ए-दिल

कितना भी करूं दिल पे काबू नही होता
खुद के सिवा किसीसे गुफ़्तगू नही होता

अनसुने अनदेखे जख्म काफ़ी है छुपे हुए
आखों से बहनेवाला क्या लहू नही होता?

किस किस कोने मे सिलवाउं दिल को
वो दर्जी तो कहता है अब रफ़ू नही होता

जलती बुझती आंखों मे है ख्वाबों के दिये
रोशन करे उन्हे,ऐसा कॊई जादू नही होता

मौत से ख्वामख्वाह डरते रहते है सब लोग
अकेली जिंदगी से बडा कोई उदू नही होता

(उदू - enemy )

न जाने कैसे गम ढलते जाते है शब्दोंमे
मै भी कहां शायर होता गर तू नही होता

Saturday, December 6, 2008

तू जो यहां नही..

कलम को चाहिये दर्द की स्याही ..
अब न कोई कमी, तू जो यहां नही..

यादों की पुरवाई लौट आयी थी सुबह
खुशबू भी बदल गयी है तेरी ही तरह
साहिल पे टहलता मै ही मेरा हमराही
कलम को ....

हसके बात करता है मुझसे मेरा माझी
बोला अब कैसी दुश्मनी क्या नाराजी ..
अटूट साथ है, चलती रहेगी आवाजाही
कलम को ....

समंदर भी मेरे मन जैसा फ़ैला हुआ
हर किनारा है मरहम से सिला हुआ
सपनो की रेत धोने लहरें आई मनचाही...

कलम को चाहिये दर्द की स्याही ..
अब न कोई कमी, तू जो यहां नही..

Monday, November 24, 2008

थोडा खुदसे बात करो

थोडा खुदसे बात करो, दिल खिल जाता है
अकेलापन दोस्त की तरह घुलमिल जाता है

दिल ही दिल मे इतना रोए है अब तक
छलकता आंसू आंखो मे ही सिल जाता है

पता नही कौनसे आसमां की आस है ये
तेरे ही सपनो के कोहरे मे ये दिल जाता है

तुने कोई आशा दिखाई भी तो न थी कभी
जाने क्यूं फ़िर निराशा से मन छिल जाता है

कितनी दफ़ा सोचा है, तुझपे कुछ न लिखू
लब्जों के कतरे कतरे मे तूही मिल जाता है

Friday, November 21, 2008

पहिली भेट

तुझे आज भेटणे
अन माझे बस्स
अनिमिष पाहणे..

तू सहजच बोलणे
अन मा कवीला
शब्दच न सुचणे

तू कोवळेसे हसणे
माझे अचूकपणे
सर्व मोती झेलणे

घड्याळात पाहणे
मनात नसूनही
निरोप चाचपणे

पहिल्या भेटीचा
उत्साह आवरणे
पुन्हा भेटायचे
स्वप्न पालवणे

Thursday, November 13, 2008

कधी कधी काहीही वाटतं

कधी कधी काहीही वाटतं

आकाशाला न्याहाळावं वाटतं
जमिनीला कुरवाळावं वाटतं
सुरांमधे विरघळावं वाटतं
शब्दांवाटॆ ओघळावं वाटतं

मनापासून प्रेम करणारी
तिजवर उगा रुसावं वाटतं
तिला कावरंबावरं पाहून
जवळ घेउन बसावं वाटतं

स्वतःशीच बोलता बोलता
गावभर एकटंच हिंडावं वाटतं
गप्पांचा अड्डा जमवून
पत्त्यांचा डाव मांडावं वाटतं

ह्रुषिकेश मुखर्जींच्या अमर
आनंद सारखं जगावं वाटतं
हसता हसता रडवणाऱ्या
आठवणी देउन मरावं वाटतं